
बेसिक शिक्षा का यह साल वास्तव में उथल-पुथल और अव्यवस्था का साल रहा है। पेयरिंग कम मर्जर, सरप्लस और स्वैच्छिक समायोजन की जल्दबाजी में लागू गई नीतियों ने स्कूलों का संतुलन बिगाड़ दिया। कहीं शिक्षक अधिक, कहीं बेहद कम, कहीं विषयवार असमानता, और कहीं एक ही शिक्षक पर पूरा विद्यालय लाद दिया गया। जैसे-तैसे लोग समायोजन की धूल बैठने का इंतजार कर रहे थे कि डिमर्जर ने फिर नई हलचल खड़ी कर दी। हर स्तर पर जिम्मेदार अपनी गलती नीचे वालों पर डालकर बच निकलने की कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। नतीजा यह है कि न्यायालयों में याचिकाओं की बाढ़ आ गई है, शिक्षक आपस में ही एक-दूसरे को दोषी ठहराने और कानूनी लड़ाइयों में उलझते जा रहे हैं, जबकि असली समस्या नीति निर्माण की अनिश्चितता और अस्थिरता है।
ऊपर से टेट अनिवार्यता पर आए निर्णय ने आग में घी डाल दिया है। लाखों शिक्षक मानसिक तनाव में हैं, भविष्य को लेकर असुरक्षा है, और संघर्ष की रफ्तार ने शिक्षा को विचार का विषय नहीं, बल्कि कोर्ट-कचहरी का मामला बना दिया है। यह पूरा परिदृश्य बताता है कि *विभाग अब किसी दीर्घकालिक सोच, शोध आधारित योजना या सजग नीति से नहीं, बल्कि प्रतिदिन के आदेशों, विभागीय व्हाट्सऐप ग्रुप सक्रियता और फॉर्म-पोर्टल-एप के बोझ से चल रहा है।* ऐसा लगता है मानो शिक्षा प्रणाली को भ्रमित और व्यस्त बनाए रखना ही नया प्रबंधन मॉडल बन गया है, ताकि कोई मूल प्रश्न पूछ ही न सके।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इतने झटकों के बावजूद कोई यह सोचने को तैयार नहीं कि शिक्षा का उद्देश्य क्या बचा है? स्कूलों में बच्चे कहाँ हैं, सीखना कितना हो रहा है, शिक्षक पढ़ा भी पा रहे हैं या नहीं, इन प्राथमिक सवालों पर सन्नाटा है।
कुछ मित्र सलाह देते हैं कि उक्त हालात पर लिखने से क्या होगा? यह सवाल भी उतना ही कड़वा है जितनी स्थिति। दरअसल यह पूरा संकट अनिर्णय, बिना पायलट प्रोजेक्ट किए लागू किए गए निर्णयों और दूरदर्शी नीति की अनुपस्थिति का परिणाम है। जिम्मेदारों ने शिक्षा को सुधारने की जगह “नई पहलें शुरू करो, फोटो भेजो, रिपोर्ट दो” वाला मेले जैसा माहौल बना दिया है। किसी भी नीति को पाँच या दस वर्ष की स्थिर योजना की ज़रूरत होती है, पर यहाँ नीति की आयु सुबह के आदेश से शाम के संशोधन तक की रह गई है।
जब तक व्यवस्था यह नहीं समझेगी कि बच्चों के भविष्य का निर्माण “ऐप एक्टिविटी” से नहीं, शिक्षकों को स्थिरता, सम्मान, प्रशिक्षण और शिक्षण का माहौल देने से होगा, तब तक ऐसे साल आते रहेंगे और हम इन्हें “सबसे खराब” कहते रहेंगे। यह समय आत्ममंथन और साहसी सुधारों का है, न कि आदेशों की भरमार और एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने का।
अब समय है कि शिक्षा विभाग यह निर्णय ले—क्या उसे “शिक्षा” चलानी है या “इवेंट-मैनेजमेंट सिस्टम”? क्या उसे “सीखने का माहौल” बनाना है या “डिजिटल सबूत” जमा करना? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वह शिक्षक को व्यवस्था का गुलाम मानेगा या भविष्य का निर्माता? जब तक इसका उत्तर ईमानदारी से नहीं खोजा जाता, बेसिक शिक्षा की नाव ऐसे ही हर साल नई आँधियों में डगमगाती रहेगी, और सबसे ज्यादा नुकसान उसी को होगा, जिसके नाम पर यह पूरी व्यवस्था खड़ी है— बच्चे को।








